Home आलेख दुआओं में शामिल,बुरी आदत,एक मित्र,साहुजी समौसा वाले-महेश राजा की लघुकथा

दुआओं में शामिल,बुरी आदत,एक मित्र,साहुजी समौसा वाले-महेश राजा की लघुकथा

रीमा थी। सॉरी राज,मैं पूजा कर रही थी।तुम्हारा फोन उठा नहीं पायी। मेरी पूजा तो अब पूरी हुयी

महासमुंद- जिले के ख्यातिप्राप्त लघुकथाकर महेश राजा की लघु कथाए दुआओं में शामिल,बुरी आदत,एक मित्र,साहुजी समौसा वाले महेश राजा सुधि पाठकों के लिए उपलब्ध है

दुआओं में शामिल-फोन बजा,राज ने समय देखा फिर उठा लिया। रीमा थी। सॉरी राज,मैं पूजा कर रही थी।तुम्हारा फोन उठा नहीं पायी। मेरी पूजा तो अब पूरी हुयी। वो कैसे? अरे बाबा तुमसे बात जो हो गयी। राज,कुछ भी…..,अच्छा बताओ कहाँ हो? हमेशा की तरह मंदिर के पास। मेरे लिये कुछ माँगा राज…सचमुच… मुझे इसकी जरूरत है। राज कहना चाह रहा था,तुम ही तो पूजा हो….देवी हो…। तुम्हारे लिये क्या माँगता।

-यह भी कोई कहने की बात।तुम तो मेरी हर दुआओं में शामिल…अवि के लिये भी प्रार्थना की है….। अपने लिये कुछ माँगा? तुम जानती हो न….मैं….।मुझे किस चीज की कमी।अच्छा बताओ ,अस सिरदर्द कैसा है? रीमा हँसी- राज,यह तो दाम्पत्य जीवन का हिस्सा है।आजीवन साथ रहता है। तुम न..जीवन दर्शन छोडो।अपना ख्याल रखो,अपने लिये न सही,अवि के लिये…मेरे लिये….हम सबको तुम्हारी जरूरत है।

अलादीन जीन और कवि महोदय,गुनगुनी घूप,पालक,छोटा सा इंद्रधनुष-महेश राजा

दुआओं में शामिल,बुरी आदत,एक मित्र,साहुजी समौसा वाले-महेश राजा
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अवि क्या कर रहा है? सोया है,उसी को उठाने जा रही हूँ। 8.40आन लाइन क्लास है।नाश्ता बनाना है।मन नहीं कर रहा।कुक आँटी का वेट कर रही हूँ।अच्छा सुनो अदरक वाली चाय बना रही हूँ,पीयोगे? ऐसे हमारे नसीब कहाँ?जिस दिन अपने हाथ से बनी चाय पिलाओगी न।मेरे लिये अमृत समान होगा।अच्छा छोडो मैं तुम्हें कुछ होमवर्क देता हूँ।
प्लीज राज,आज नहीं… आल रेडी काम के बोझ तले दबी हुयी हूँ।

-अरे ज्यादा कुछ नहीं… एक समूह में कथा भेजनी है। दूसरे रानी लक्ष्मी बाई पर कविता..सिम्पल। राज,लगता है अब थक गयी हूँ। इतने सारे काम शेष है।तुम्हारे आने से अवि की चिंता से तो मुक्त हो गयी।पर…शोध कार्य में पिछड़ गयी हूँ।नहीं कर पा रही हूँ।मेरे लिये दुआ करो ना..प्लीज। तुम चिंता मत करो।धैर्य से सब होगा।ठीक होगा। दुआओं का मुझ पर छोड़ दो।अच्छा….अब तुम चाय पीयो..।शाम को आफिस के बाद बात करूंँगा।

बुरी आदत

बुधारु दिन भर रिक्शा चलाकर घर आया।रमिया ने उसे पानी का लोटा दिया। बुधारु ने बेटे रामू के बारें में पूछा तो रमिया ने बताया वह दोस्त के साथ खेल रहा है। बुधारु की बीड़ी समाप्त हो गयी थी।रमिया से बोला,रामू को पुकार कर मेरे लिये नुक्कड़ से बीड़ी माचिस मँगवा दे।

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दुआओं में शामिल,बुरी आदत,एक मित्र,साहुजी समौसा वाले-महेश राजा

रमिया ने पास आकर कहा,ऐ रामू के बाबू।क्या तुम यह चाहते हो की हमारा रामू किसी गलत आदत में पड़े।तुम बीड़ी बाहर से पीकर आया करो।या फिर यह बुरी आदत छोड़ दे।मैं तुम्हारे गोड़ पड़ती हूँ, रामू से बीड़ी मत मँगाना।नहीं तो उसे भी आदत पड़ जायेगी। कुछ सोच कर बुधारु ने सिर हिलाया,ठीक ही है।अच्छा चल रोटी और गोंदली दे खूब भूख लगी है।

एक मित्र

तीन चार लोगों का समूह था।नगर में अपने अपने गुणों की वजह से विख्यात भी थे। कोई भी कार्यक्रम, चाहे राजनीति, साहित्य या अध्यात्म का है;वे सब अनिवार्य रुप से उपस्थित रहते। लाफिन गांव में श्री मदभागवत का आयोजन था।

एक कथा रसिक श्रोता ने उन्हें बताया कि -“कल से लाफिन में श्रीमद भागवत कथा का आयोजन है।वृदांवन से बहुत ही गुणी कथा वाचक पधार रहे है।आप सब अवश्य पधारे और कथा का आनंद ले।” सभी ने सहर्ष हामी भरी।अध्यात्म की बात होने लगी।नौ दिवस सत्संग का लाभ मिलेगा,यह अत्यंत हर्ष का विषय था। तभी उनमें से एक मित्र आदतन पूछ बैठे,-“भंडारे का आयोजन कब रखा गया है.”

साहुजी समौसा वाले

तुमगांव चौक के सामने एक छोटी सी टपरी नुमा होटल।पर,भीड इतनी कि जगह कम पडे।सुबह छह बजे से रात नौ बजे तक गरमागरम नाश्ता उपलब्ध। है न आश्चर्य की बात!पर यह सत्य है।लोगों की कतार लगी रहती है।कीमत दस रूपये प्लेट,तीन चटनियों के साथ।यहाँ हर समय गरमागरम समौसे तैयार मिलते है।साथ ही शाम को आलूगुंडा,प्याजी बहे और मुंगोडी यहाँ की विशेषता है। शिक्षा कर्मी हो या ट्रेफिक पुलिस सब यहां खडे होकर लजीज नाश्ते का आनंद उठाते है।यहाँ के समौसे बहुत प्रसिद्ध है।महँगाई के इस युग में इतना सस्ता।यकीन नहीं होता।लोग एक पीस समौसा ले कर दो बार गरम चटनी का आनंद लेते है।

वैसे तो यह होटल किसी देवांगन जी की है,पर इसे चलाते है ;भाई छन्नू साहु।अपने व्यवहार के कारण लोग सहज ही आकर्षित होते है। एक बार पूछा था कि’ इस कदर महंगाई में आप इतनी सस्ती चीजें कैसे बेच लेते हो?”।इस पर वे मुसकुराये।फिर उन्होंने जो बताया वह बहुत ही भावपूर्ण था।

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.वह बोले,-“बाबूजी गाँव से एक बार यहाँ आये थे।उन्हें बहुत भूख लगी थी।जेब में रूपये न थे।बस स्टेशन पर लखन होटल के पास खडे होकर भट्टी से नाश्ता उतरते देख रहे थे।तभी एक अजनबी ने आकर उनके कँधों पर हाथ रख कर कहा,”समौसे खाओगे?”वह संँकोच के मारे चुप रहे। अजनबी ने एक समौसा लाकर उन्हें दिया था।इस बात को बाबू जी ताउम्र न भूल पाये।

हम सबको बार बार बताते।शायद!यही वजह है,और इस शहर का कर्ज है , मुझ पर कि मैं यहाँ समौसे ,इस कीमत पर बेच रहा हूं।”कहते कहते साहुजी भावुक हो गये। तभी ढेर सारे समौसे भरकर एक कामगार आया और परात में रख कर उसे जमाने लगा।लोगों की भीड़ टूट पडी।साहुजी तृप्त नजरों से यह सब निहार रहे थे।

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