महासमुंद: स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग में करोड़ों के फर्जीवाड़े की जांच व दोषियों पर एफआईआर दर्ज करने की मांग पूर्व संसदीय सचिव विनोद सेवनलाल चंद्राकर ने की है । जारी विज्ञप्ति में चंद्राकर ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तुमगांव और शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सिरपुर में सामने आए आर्थिक अनियमितताओं के मामलों की उच्चस्तरीय जांच कर दोषीयो पर कड़ी कार्रवाई की बात कही है।
उन्होंने आगे कहा कि सरकारी धनराशि का फर्जी तरीके से आहरण गंभीर आर्थिक अपराध की श्रेणी में आता है, लेकिन प्रशासन केवल कुछ कर्मचारियों को निलंबित कर मामले को दबाने का प्रयास कर रहा है। उनका कहना है कि यदि निष्पक्ष और गहन जांच कराई जाए तो कई अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी उजागर हो सकती है।
श्री चंद्राकर ने आरोप लगाया कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तुमगांव में लंबे समय से वेतन भुगतान में शून्य बढ़ाकर लाखों रुपये की राशि का गबन किया गया। इस मामले में तत्कालीन और वर्तमान बीएमओ, लेखापाल तथा जिला कोषालय के कुछ अधिकारी-कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी वेतन बिल तैयार कर राशि निकाली गई। उन्होंने बताया कि विभिन्न कर्मचारियों के खातों में मूल वेतन से अधिक कुल लगभग 67 लाख रुपये का भुगतान किया गया।
स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग में करोड़ों के फर्जीवाड़े की जांच हो-विनोद चंद्राकर
उन्होंने कहा कि फिलहाल केवल लेखापाल और जिन कर्मचारियों के खातों में अतिरिक्त राशि गई, उन्हीं पर कार्रवाई की गई है, जबकि जिला कोषालय और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि वेतन देयक जिला कोषालय में कई स्तरों की जांच के बाद ही स्वीकृत होते हैं, इसलिए बिना अधिकारियों की सहमति इतनी बड़ी अनियमितता संभव नहीं है।
पूर्व विधायक ने गरियाबंद जिले के पुराने मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी इसी प्रकार के फर्जी भुगतान प्रकरण में स्वास्थ्य विभाग और कोषालय अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तारी की गई थी। उन्होंने मांग की कि महासमुंद मामले में भी उसी प्रकार निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए।
इसी तरह शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सिरपुर में सहायक ग्रेड-2 कर्मचारी द्वारा स्वयं को व्याख्याता एलबी दर्शाकर लगभग 13 लाख रुपये वेतन आहरण करने के मामले को भी गंभीर बताते हुए श्री चंद्राकर ने कहा कि इस फर्जीवाड़े में विद्यालय प्रबंधन, जिला शिक्षा विभाग और कोषालय अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी कर्मचारी का पदनाम और वेतनमान बदलना बिना विभागीय अनुमति और कोषालय सत्यापन के संभव नहीं है। इसके बावजूद महीनों तक गलत वेतन भुगतान होना प्रशासनिक लापरवाही और मिलीभगत को दर्शाता है।
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