Home खास खबर ग्रामीणों की सोच से भालूओं के लिए पहाड़ पर ही हुई दाना-पानी...

ग्रामीणों की सोच से भालूओं के लिए पहाड़ पर ही हुई दाना-पानी की व्यवस्था

वीरान पहाड़ी पर वृक्षारोपण कर वन्य प्राणियों का संरक्षण,मनरेगा और वन विभाग के अभिसरण से पहाड़ पर लगाए गए 25 हजार पौधे

0
131
raipur-23-3

रायपुर-जांजगीर-चांपा जिले के सक्ती विकासखंड के मसनियाकला और मसनियाखुर्द गांव के ग्रामीणों की सोच से, भालूओं के लिए पहाड़ पर ही दाना-पानी की व्यवस्था हुई। मसनिया पहाड़ पर कुछ साल पहले तक हरियाली ,का नामो-निशान तक नहीं था। पेड़-पौधों से वीरान इस पहाड़ी पर खाने-पीने की कमी हुई तो भालू एवं अन्य वन्य प्राणी गांव की तरफ खींचे चले आए।

नतीजतन भालू और ग्रामीण बार-बार आमने-सामने होने लगे, जिससे कभी भालू तो कभी ग्रामीण घायल हुए। भूख के कारण भालू फसलों को भी नुकसान पहुंचाने लगे। इससे ग्रामीणों में भय व्याप्त रहने लगा और वे इस समस्या, से निजात पाने का रास्ता तलाशने लगे।

भालूओं के लिए पहाड़ पर ही हुई दाना-पानी की व्यवस्था गांववालों ने आपस में चर्चा कर भालूओं को पहाड़ एवं जंगल में ही संरक्षित करने की योजना बनाई। मसनियाकला ग्राम पंचायत और आश्रित गांव मसनियाखुर्द में ऐसे पौधे लगाने पर विचार किया गया जिससे कि भालूओं को जंगल में ही खाने को मिल जाए और वे गांव की तरफ न आए।

इसके लिए मनरेगा और वन विभाग की योजनाओं के अभिसरण से पहाड़ पर वृक्षारोपण का रास्ता निकाला गया। वर्ष 2017-18 में अगले पांच वर्षों के लिए योजना तैयार कर इसे अमलीजामा पहनाया गया। लगभग 25 एकड़ जमीन पर मिश्रित पौधों का रोपण किया गया जिसमें सागौन, डूमर, खम्हार, जामुन, आम, बांस, शीशु, अर्जुन, केसियासेमिया और बेर के 25 हजार पौधे शामिल थे।

इस काम के लिए मनरेगा से 29 लाख 38 हजार रूपए स्वीकृत होने के बाद श्रमिकों ने अपनी सहभागिता निभाते हुए दुर्गम मसनिया पहाड़ी पर पौधे रोपने का काम शुरू किया। यह काम मुश्किल था क्योंकि पौधरोपण के बाद पानी की कमी के चलते अधिक समय तक वह जिंदा नहीं रह पाता था।

पानी की समस्या को दूर करने मनरेगा और वन विभाग के अभिसरण से भूजल संरक्षण के लिए करीब दस लाख रूपए स्वीकृत किए गए। इस राशि से ब्रशवुड चेकडेम, गाडकर चेकडेम, बोल्डर चेकडेक और कंटूर ट्रेंच का निर्माण किया गया। श्रमिकों ने कड़ी मेहनत से लगातार पौधों को पानी देकर व फेंसिंग कर पौधों को सुरक्षित रखा।

raipur-23-2अच्छी देखभाल से पौधे दो साल में ही वृक्ष की तरह लहलहाने लगे। वहां सागौन के 8015, डूमर के 2975, खम्हार के 1815, जामुन के 2445, आम के 2075, बांस के 1425, शीशु के 1245, अर्जुन के 1275, केसियासेमिया के तीन हजार तथा बेर के 730 पौधों को मिलाकर कुल 25 हजार पौधे रोपे गए। मजदूरों ने कांवर एवं डीजल पंप के माध्यम से इन पौधों की सिंचाई की।

वनमंडलाधिकारी प्रेमलता यादव कहती हैं कि जल, जंगल और जमीन को बचाने से ही प्रकृति का संतुलन बना हुआ है। मनरेगा और वन विभाग के तालमेल से मसनिया पहाड़ी में इस दिशा में अहम काम हुआ है। पहाड़ पर वृक्षारोपण और जल संग्रहण से वन्य प्राणी खासकर भालू स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

मसनियाकला के सरपंच  संजय कुमार पटेल बताते हैं कि पौधरोपण के बाद से इस क्षेत्र की रंगत बदल गई है। मनरेगा तथा वन विभाग के संयुक्त कार्यों से मानव व भालू के बीच द्वंद्व अब समाप्त हो गया है और वे सह-अस्तित्व की भावना से एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाए बिना साथ मिलकर रहवास कर रहे हैं। फलदार और छायादार पेड़ों ने पहाड़ को न केवल हरियाली की चादर ओढ़ाई है, बल्कि भालूओं को भी संरक्षण प्रदान किया है।

हमसे जुड़े :–dailynewsservices.com