महासमुंद।बस्तर में विकास के नाम पर विनाश की आशंका, सुरक्षा बलों की तैनाती पर पूर्व संसदीय सचिव विनोद चंद्राकर ने सवाल उठाए है । भाजपा सरकार के उस दावे पर गंभीर प्रश्न हैं, जिसमें छत्तीसगढ़ को पूरी तरह नक्सलमुक्त बताया गया है। उन्होंने कहा कि यदि प्रदेश वास्तव में 100 प्रतिशत नक्सलवाद से मुक्त हो चुका है, तो बस्तर क्षेत्र में अब भी लगभग 60 हजार सुरक्षा बलों की तैनाती क्यों बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि इन बलों में करीब 40 हजार केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान शामिल हैं। यदि स्थिति पूरी तरह सामान्य हो चुकी है, तो इन जवानों को वापस बुला लिया जाना चाहिए। लेकिन सरकार का एक वर्ष तक और बलों की तैनाती बनाए रखने का संकेत कई सवाल खड़े करता है। उनके अनुसार, इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि या तो प्रदेश अब भी पूरी तरह नक्सलमुक्त नहीं हुआ है, या फिर हसदेव की तरह अबूझमाड़ के जल, जंगल और जमीन पर भी सरकार की नजर है।
बस्तर में सुरक्षा बलों की तैनाती पर विनोद ने उठाए सवाल
श्री चंद्राकर ने आरोप लगाया कि सरकार विकास के नाम पर विनाश की रणनीति तैयार कर रही है। उनका कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों में भारी सुरक्षा बलों की मौजूदगी से यह संकेत मिलता है कि भविष्य में स्थानीय लोगों के विरोध को दबाने की तैयारी की जा रही है, विशेषकर तब जब उनके प्राकृतिक संसाधनों और जमीनों पर बाहरी हस्तक्षेप बढ़े।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ का नक्सलमुक्त होना सभी के लिए खुशी की बात है और इससे बस्तर के विकास को गति मिलनी चाहिए। लेकिन यदि विकास के नाम पर वनवासियों के अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक पहचान को नुकसान पहुंचाया जाता है, तो यह उनके साथ अन्याय होगा।
उन्होंने हसदेव अरण्य का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां पहले ही बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई कर आदिवासियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई है। अब उन्हें आशंका है कि अबूझमाड़ क्षेत्र के शेष वन और खनिज संपदा को भी इसी प्रकार कॉर्पोरेट हितों के लिए उपयोग में लाने की योजना बनाई जा रही है।
अंत में उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार की कार्यशैली को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़ का उद्देश्य केवल शांति स्थापित करना नहीं, बल्कि प्रदेश के जल, जंगल, जमीन और बहुमूल्य खनिज संसाधनों के दोहन का मार्ग प्रशस्त करना है।
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