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हलषष्ठी पर्व पर माताओं ने रखा उपवास, संतानों की सुख-समृद्धि के लिए की पूजा

सगरी कुंड बनाकर विधि-विधान से हुआ पूजन, कमरछठ की परंपराओं में दिखी आस्था और लोक संस्कृति की झलक

हलषष्ठी पर्व पर माताओं ने रखा उपवास, संतानों की सुख-समृद्धि के लिए की पूजा

खल्लारी। ग्रामीण अंचलों में हलषष्ठी यानी कमरछठ पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। माताओं ने अपनी संतानों की लंबी आयु, सुख-समृद्धि, सफलता और स्वस्थ जीवन की कामना को लेकर दिनभर उपवास रखा। इस अवसर पर महिलाओं ने सगरी कुंड बनाकर हलषष्ठी देवी की विधिवत पूजा-अर्चना की और पुरोहितों से पर्व से जुड़ी कथा का श्रवण किया।

धार्मिक स्थल खल्लारी, स्टेशनपारा सहित आसपास के अनेक स्थानों पर कमरछठ पूजा के लिए महिलाओं की भीड़ रही। पूजा स्थलों पर दो सगरी कुंड तैयार किए गए थे, जिन्हें काशी के फूलों से सजाया गया। कुंड के पास नारियल, लाई, चना, महुआ सहित विभिन्न पूजन सामग्रियां दोना-पत्तल में रखी गईं। पंडितों और महाराजों ने हलषष्ठी व्रत से संबंधित करीब छह अध्यायों की कथा का विधिवत वाचन किया।

पूजा के दौरान माताओं ने भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की आराधना कर अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और दीर्घायु के लिए प्रार्थना की। मान्यता के अनुसार पूजा के बाद माताओं द्वारा बच्चों को छह बार पोता लगाया जाता है। यह परंपरा बच्चों को बुरी नजर से बचाने और उनके मंगल की कामना से जुड़ी हुई है।

हलषष्ठी पर्व पर माताओं ने रखा उपवास, संतानों की सुख-समृद्धि के लिए की पूजा

हलषष्ठी पर्व पर छत्तीसगढ़ की पारंपरिक रीति-रिवाजों का भी पालन किया गया। व्रती महिलाओं ने बिना जोते गए खेत के पसहर चावल से भोजन तैयार किया। इसके साथ छह प्रकार की भाजियों का उपयोग किया गया। भोजन दोना-पत्तल में ग्रहण करने और पीतल के बर्तनों में प्रसाद तैयार करने की परंपरा भी निभाई गई। इस दिन भैंस के दूध, दही और घी का विशेष रूप से उपयोग किया गया।

पर्व के अवसर पर मुनगा पत्ती, बौलाई, जरी भाजी, सेमी, कुम्हड़ा पत्ती और हरी मिर्च सहित विभिन्न पारंपरिक खाद्य सामग्री से पकवान तैयार किए गए। ग्रामीण महिलाओं ने पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ कमरछठ का व्रत पूर्ण किया।

द्वापर युग से जुड़ी है हलषष्ठी व्रत की मान्यता

हलषष्ठी पर्व की धार्मिक मान्यता के संबंध में खल्लारी के महाराज भवानीदास वैष्णव ने बताया कि द्वापर युग में माता देवकी ने भी संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत रखा था। कथा के अनुसार कंस द्वारा देवकी की संतानों की हत्या किए जाने के बाद देवर्षि नारद ने उन्हें हलषष्ठी व्रत करने की सलाह दी। माता देवकी ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया, जिसके बाद भगवान कृष्ण सुरक्षित रहे।

बाद में भगवान कृष्ण और बलराम ने कंस का वध कर उसके अत्याचार का अंत किया। इसी धार्मिक मान्यता के चलते तब से माताएं अपनी संतानों की खुशहाली, दीर्घायु और सुख-शांति के लिए हलषष्ठी व्रत को श्रद्धा एवं भक्ति के साथ करती आ रही हैं।

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