Home आलेख चाय का घूँट,चाय का एक कप, घरौंदा,असल धनवान-“चाय दिवस विशेष”- महेश राजा

चाय का घूँट,चाय का एक कप, घरौंदा,असल धनवान-“चाय दिवस विशेष”- महेश राजा

महेश राजा की लघुकथा कान्वेंट कल्चर ,टेढ़ी पूँछ वाला कुत्ता ,उदाहरण व् ए.टी.एम

जिले के प्रसिद्ध लघु कथाकार महेश राजा की लघुकथा चाय का घूँट,चाय का एक कप, घरौंदा,असल धनवान-“चाय दिवस पर विशेष”सुधि पाठकों के लिए उपलब्ध है ।
चाय का घूँट-राज ने खिडक़ी खोली।हवा का ताजा झोंका पूरे शरीर में स्फूर्ति भर गया। चाय के प्याले से एक घूंट पीया। अच्छा लगा। उसे लगा,दूर आसमान से कोई उसे देख रहा है।उसने चाय की चुस्की लेते हुए अजीब सी आवाज निकाली।कोई नहीं था।राज चुपचाप चाय पीने लगा।

उसे याद आया ,बचपन के वो सुनहले पल।पीले फ्राक में वह गोलमटोल लड़की।बहुत लड़ती थी उससे।उसे राज का चाय पीना पसंद न था।राज चाय पीते जानबूझकर कर आवाज निकालता।वह कहती,तुम बहुत बुरे हो राज।इस तरह से चाय पीता है कोई भला।

समय बीतता गया।वे बड़े हो गये।सब कुछ बदल गया।सब अपनी अपनी जगहों पर सेटल हो गये। आज राज को उस लड़की की बहुत याद आयी।उसने चाय का एक घूँट लिया और अजीब सी आवाज निकाली।उसे महसूस हो रहा था कोई आये और इस तरह से आवाज करने पर उसे डाँटे। राज को मायूस होना पड़ा।दूर-दूर तक कोई न था।सब कुछ अकेला….उदास….लूटा लूटा….।

शपथ-शहीद दिवस,जल ही जीवन विश्व जल दिवस पर विशेष-लघु कथा महेश राजा

चाय का घूँट,चाय का एक कप, घरौंदा,असल धनवान-"चाय दिवस विशेष"- महेश राजा
all fail foto

 चाय का एक कप

राज ने फोन लगाया।थोड़ा ठहर कर जवाब आया।रीमा की हमेंशा की तरह तरोताजा आवाज। क्या कर रही हो? चाय पी रही थी,तुम? मैं भी।आफिस से आ गयी? हाँ ,आज जल्दी आ गयी।और सुनाओ? हम कब मिल रहे है?साथ साथ चाय का एक कप कब पीयेंगे?”

साहित्य पर चर्चा हुए काफी दिन हो गये। हाँ….सच कहा…-बहुत जल्द.. मिलेंगे और एक कप क्यों? कई कप चाय होगी और खूब किस्से गढ़े जायेंगे….।

 घरौंदा

सुबह सुबह चाय के साथ अखबार लेकर वे अपने घर के अहाते में शांत बैठे थे। अचानक कुछ शोर उठा सामने ही एक बडा बँगला बन रहा था।कामगार आ गये थे। घर के बाहर ईंट,पत्थर और रेती का जमावड़ा रहता।खूब धूल उड़ती। कालोनी में यह सब सामान्य बात थी।सब आदि हो गये थे।

थोड़ी देर बाद घर के जंगले से देखा तो एक छोटा लड़का और लड़की वहाँ पड़ी रेत से घर बना रहे थे।छोटी बच्ची पैर के उपर रेत डालती और हाथों से घर या मंदिर का रूप देती।बार बार रेत धसक जाती।छोटा लड़का थोड़ा पानी और कुछ लकड़ियाँ, कुछ फूल ले आया।अब दोनों साथ मिलकर प्रयास करने लगे।वे अनायास मुस्कुरा दिये।

साहित्यिक पक्षधरता,भूख कीआग,वादा व् व्यंग्य की समझ:- महेश राजा की लघु-कथा

चाय का घूँट,चाय का एक कप, घरौंदा,असल धनवान-"चाय दिवस विशेष"- महेश राजा

उन्हें अपना बचपन याद आ गया।उनके जीवन की पहली गोलमटोल लड़की,पीली फ्राक पहने रोज मिलती।वे घर घर खेलते लड़ भी पड़ते।फिर मिल भी जाते। अचानक कुछ आवाज से उनकी तंद्रा टूटी।देखा किसी बात से नाराज़ लड़का बने बनाये घर को उजाड़ने में लगा था।लड़की रो रही थी।

वे दौड़े-दौड़े बाहर आये।उन्होंने समझा कर लड़के को रोका।ऐसा नहीं करते बेटे…..।यह अच्छी बात नहीं…।फिर बच्ची को चुप कराया।स्वयं अपने हाथों से घर बनाकर दिया।अब दोनों हँसते हुए खेलने लगे। वे वापस अपनी आराम कुर्सी पर आ कर बैठ गये।स्वतः बोल उठे-“नहीं.. नहीं.. बच्चे ..ऐसा मत करना…घर मत तोड़ना…बहुत तकलीफ़ होती है,जब घरौंदा उजड़ जाता है।

आँखों से आँसू टपक पड़े।उन्होंने भी बचपन में यही किया था।स्वयं के हाथों बना बनाया घर उजाड़ दिया था।पीले फ्राक वाली गोल मटौल लड़की रोते हुए घर चली गयी थी।फिर कभी भी लौटकर न आयी ,उनके जीवन में। उस दर्द,उस कसक को सीने से लगाये वह आज भी जी रहे है।किसी को खो देने की तकलीफ़ क्या होती है,?उस सजा को… किश्त दर किश्त में काटते हुए एक कारावास- सा जीवन वे जी रहे हैं।यही सत्य है, शायद इसी का नाम जीवन है…..।

पडोस से भूपेन्दर सिंगजी की गजल की सदा आ रही थी-“सपनों का घरौंदा टूटा……। आँखों से अविरल गर्म आँसूओं की धारा बह रही थी।

असल धनवान

रीमा को सप्ताह में दो बार मुख्य बाजार तक आना ही पड़ता है। नेहरू चौक पर बहुत सारी दुकानों के साथ खाली जगहों पर फलवाले मोची और अन्य लोग बैठकर दुकानदारी करते। वहीं कोने पर एक ग्रामीण महिला मिट्टी के घडे,गुल्लक और अन्य सामान लेकर बैठती।वह हमेंशा हँस कर बात करती।उम्र ज्यादा न थी।पर,वक्त के थपेडों ने असमय उसे वृद्धा बना दिया था।चेहरे पर की झुर्रियाँ अनुभवों की आँच से तप कर निकलने का दावा कर रही थी।

रीमा हमेंशा कुछ न कुछ खरीदी करती।कभी भी मोल भाव न करती।वापसी में आज भी वह रूकी एक घड़ा और दो सकोरे लिये।माँजी ने कीमत सौ रूपये बतायी।रीमा के मुँह से निकलने ही वाला था कि हमेंशा तो आप बीस रूपये लगाती है।एन वक्त पर उसने स्वयं को रोका और चुपचाप सौ रूपये दे दिये।

CM भूपेश बघेल ने किसानों के लिए सुपर कम्पोस्ट खाद की लॉच

चाय का घूँट,चाय का एक कप, घरौंदा,असल धनवान-"चाय दिवस विशेष"- महेश राजा

घड़ेवाली महिला ने उसके चेहरे के भाव पढ़ लिये थे।गाड़ी में घड़ा और सकोरा रखते हुए उसने रीमा को दस रूपये लौटाये,बेटी,तुम कभी कुछ नहीं कहती।आज मेरा मन है।यह रख लो। रीमा मन में आये विचारों के कारण आत्मग्लानि से ग्रस्त थी।रीमा ने मन ही मन संकल्प किया भविष्य में वह मेहनतकश लोगों से कभी मोलभाव नहीं करेगी।वे जो कहेंगे वही देगी। रीमा की आँखों से आँसू टपक पड़े।उक्त महिला को भी भाव पढ़कर रोना आ गया। दोनों काफी देर तक मौन खड़े रहे।

हमसे जुड़े :–https://dailynewsservices.com/