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गुरु दक्षिणा,ये मोह मोह के धागे,पुरस्कार,व्यंजनों का मजा- महेश राजा की लघु कथा

रिया का शोध प्रबंध समाप्त हो गया था।कल सबमिट करना था। आज शाम को पी.के.सर ने अंतिम रूप देने घर बुलाया था। सर बहुत सख्त मिजाज थे

महासमुंद- जिले के ख्यातिप्राप्त लघुकथाकर महेश राजा की लघु कथाए गुरु दक्षिणा,ये मोह मोह के धागे,पुरस्कार,व्यंजनों का मजा सुधि पाठकों के लिए उपलब्ध है

गुरु दक्षिणा-रिया का शोध प्रबंध समाप्त हो गया था।कल सबमिट करना था। आज शाम को पी.के.सर ने अंतिम रूप देने घर बुलाया था। सर बहुत सख्त मिजाज थे।अकेले रहते थे। मन में घबराहट लिये रिया सारे कागजात लेकर सर के घर पहुंँची।शाम घिर आयी थी। कालोनी सुनसान थी। डरते डरते रिया ने बेल बजायी।

सर ने दरवाजा खोला। लगभग एक घंटे चुपचाप वे पढ़ते रहे। अंत में रिया को बताया,एकदम सही है।
रिया को ढाढस महसूस हुयी। तभी सर ने कहा,तो मिस रिया अब तो आप डाक्टर कहलायेंगी।मेरी गुरु दक्षिणा? अब रिया को डर लगने लगा।कालेज के सारे सहकर्मियों ने पुरूष लोगों की मानसिकता को अलग ढंग से बताया था।

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-सर,आप बतायें।संभव होगा वह मैं जरूर दे सकूँंगी। सर ने आवाज लगायी,रामू सब सामान ले आओ। एक बुजुर्ग ट्रे लिये आया।उसमें ढेर सारी वस्तुएं थी।चाय ,नाश्ता।अन्य उपहार की वस्तुएं। सर ने कहा,देखो रिया,आज तक तुम मेरी स्टुडेंट थी। अब यह भूमिका समाप्त हुयी।मेरी कोई संतान नही है।पत्नी तो पहले ही चल बसी।क्या तुम मेरी बेटी बनना पसंद करोगी?

एक आश भरी नजरों ने सर ने उसे देखा।रिया की आँखों में आँसू आ गये।उसके पिता नही थे।रिया सर के चरणों में झुकी।सर बोले-“अरे,अरे।बेटियाँ पैर नहीं पड़ती।” दोनों मिल कर चायनाश्ते का आनंद लेने लगे।सर ने उसे ढेर सारे उपहार दिये। दरवाजे पर रामूकाका अपने आँसुओं को छिपाते खुश हुए।

ये मोह मोह के धागे

अभि सुबह से परेशान था।वह कुछ ढ़ूंढ़ रहा था। सभी पूछ पूछ कर थक गये। अपनी पुरानी अलमारी को खंगाल ड़ाला।अंततः दराज में उसे मनवांछित वस्तु मिल गयी।वह खुश हो गया। दरअसल यह एक फ्रेंड़शीप बैंड़ था,जो पिछले बरस उसके मित्र पवन ने उसे दिया था।फिर वे गुजरात चले गये। आज पवन की बड़ी याद आ रही थी।अभि ने स्नान कर बैंड़ को हाथ में पहना।अब वह आनलाइन क्लास के लिये तैयार था।

पुरस्कार

रीमा के लिये आज का दिन खास था।उसकी रचना को गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में स्थान मिला। रीमा अपनी प्रसिद्धि नहीं चाहती थी,पर साहित्य में ऐसा कुछ करना चाह रही थी कि एक ही रचना से उसकी पहचान हो। सबसे पहले राज ने बधाई दी।उसे सलाह दी कि सोशल मीडिया में और समाचार पत्रों में भेजे। पति उठ गये थे।गरम पानी आदि देकर रीमा ने ड़रते हुए बताया तो वे मुस्कुरा दिये। स्नान कर आये और दस हजार रू. देते हुए बोले,तुम अपने लिये कुछ उपहार ले लेना।

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रीमा की आँखों से आँसू टपक पड़े।उसने रुपये नहीं लिये।मन ही मन इतना कहा,आप ने मुझसे हँस कर बात की यही मेरा सच्चा पुरस्कार है।बस!आप मुझे अपने हिस्से का वक्त दे दो और मेरे पत्नी धर्म का अधिकार दे दो।बस!इसके अलावा मुझे कोई पुरस्कार नहीं चाहिये।

व्यंजनों का मजा

शादी का सीजन चल रहा था। काफी दिनों से घर पर रहकर,घर का खाना खाकर लोग ऊब गये थे।वे एन्जॉय करना चाह रहे थे।फिर आज तो हद हो गयी।चार निमंत्रण एक साथ मिले।आफिस के मित्रों मे हडकंप मच गया ।सारी पार्टियां एक ही रोज है,कहाँ कहांँ जाये।खाने के शौकीन मुंगेरी लाल ने तो यहाँ तक कह दिया कि….एक ही दिन क्यों म. रहे है।अलग अलग दिनों मे रखते तो हर जगह अलग अलग व्यंजन खाने का आनंद आता।

मैंने पूछा,”-अब क्या करोगे?” वह बोले-“पता लगाते है कि किसके यहां अच्छा माल बना है।वहीं पहले चलेंगे।सौ रूपये का लिफाफा देंगे ,तो कुछ तो वसूल करना ही पडेगा न।” मैंने कहा-“यह तो तुम्हारी आदत में शामिल है।,सौ की जगह दो सौ रूपये वसूल नहीं लेते,कोई काम नहीं करते ।तुम्हारी इस रूचि से तो पूरा आफिस परीचित है।”

परिचय

महेश राजा
जन्म:26 फरवरी
शिक्षा:बी.एस.सी.एम.ए. साहित्य.एम.ए.मनोविज्ञान
जनसंपर्क अधिकारी, भारतीय संचार लिमिटेड।
1983से पहले कविता,कहानियाँ लिखी।फिर लघुकथा और लघुव्यंग्य पर कार्य।
दो पुस्तकें1/बगुलाभगत एवम2/नमस्कार प्रजातंत्र प्रकाशित।
कागज की नाव,संकलन प्रकाशनाधीन।
दस साझा संकलन में लघुकथाऐं प्रकाशित
रचनाएं गुजराती, छतीसगढ़ी, पंजाबी, अंग्रेजी,मलयालम और मराठी,उडिय़ा में अनुदित।
पचपन लघुकथाऐं रविशंकर विश्व विद्यालय के शोध प्रबंध में शामिल।
कनाडा से वसुधा में निरंतर प्रकाशन।
भारत की हर छोटी,बड़ी पत्र पत्रिकाओं में निरंतर लेखन और प्रकाशन।
आकाशवाणी रायपुर और दूरदर्शन से प्रसारण।
पता: महेश राजा वसंत /51,कालेज रोड़।महासमुंद।छत्तीसगढ़।
493445
मो.नं.9425201544

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