महासमुंद–जिले के ख्यातिप्राप्त लघुकथाकर महेश राजा की लघु कथाए परायी सोच,सिलसिला,पेट की खातिर व् भय सुधि पाठकों के लिए हर शनिवार की तरह इस शनिवार को भी उपलब्ध है ।
परायी सोच-रात से बारिश हो रही थी।समीर जी झूले में बैठकर आज का अखबार पढ़ रहे थे। सुनीता जी अदरक वाली चाय के दो प्याले लिये आयी।पास रखी कुर्सी पर बैठ गयी।रात से घुटनों में बड़ा दर्द था।रात भर कराहती रही।समीर भी जाग रहे थे। काफी इलाज करा लिया था।बेटा भी माँ की सेहत को लेकर चिंतित रहता।परंतु उम्र अपना असर दिखाती ही है।
चाय की चुस्कियों के बीच सुनीता जी कह रही थी-“ओ जी,आज अगर हमारी बेटी होती तो कितना अच्छा रहता।घर के काम में मेरी मदद करती।यह घुटने का दर्द कमबख्त…..। समीर आश्चर्य से पत्नी की तरफ देख रहे थे।आज के हालात देख कर बेटी न हो वे हमेंशा ऐसा कहती ।उन्होंने एक ही बेटे को जन्म दिया था। समीर ने कई बार कहा कोई कामवाली रख लो।पर सुनीता को यह पसंद नहीं था।वे घर के काम हाथ से ही करना पसंद करती।
पहनावा,वट सावित्री के घागे,नशा-महेश राजा की लघु कथाए

समीर जी ने चाय समाप्त कर चुटकी ली-“अब तो तुम्हारा लाड़ला पढ़ाई पूरी कर लौट रहा है।उसका ब्याह कर दो।फिर खूब लाड़ लड़ाना बहु-बेटे का।” सुनीता जी ने गहरी साँस ली-“कहाँ हो पायेगा ऐसा? बहु तो पराये घर से आयेगी न। फिर बेटे की जाब भी शहर में होगी।वह तो बहु को लेकर चला जायेगा न। वे हमारे साथ कहाँ रह पायेंगेफिर रह जायेंगे हम दोनों अकेले…..।
समीर जी कहना चाह रहे थे।इसी सोच को बदलने की जरूरत है।बहु को बेटी बनाकर रखा जाये तो सब ठीक हो जाता है।फिर सायास कह उठे-” हम अकेले कहाँ है।हम साथ-साथ है न।एक दूजे के लिये। फिर जब मन चाहेगा जाकर रहेंगे न उनके पास।। वे भी तो समय-समय पर आते रहेंगे।” यह कह कर वे मुस्कुराने की असफल कोशिश करते रहे। सुनीता जी चाय के कप को सिंक में ले जाकर धोती रही।फिर सोच में ड़ूब गयी।बेटे के भविष्य को लेकर। बारिश और भी तेज हो गयी थी।
सिलसिला-
-“क्या सोच रही हो?” “सोचने के लिये अब कुछ नहीं है।” इतनी चुप क्यों हो?कुछ कहती क्यों नहीं।”
-“कहने सुनने को अब कुछ बाकी नहीं बचा।” “इतनी तल्खी?आखिर क्यों?” “सोचो,शायद!कुछ याद आ जाये।”
-“इस तरह से कैसे चलेगा?” जैसा पहले चलते आया है।फिक्र मत करो,तुम्हारी गृहस्थी वैसे ही चलती रहेगी।तुम्हारा खाना,पीना,कपड़े,सोना और बच्चों की जिम्मेदारी।सब करती रहूँगी। और हाँ ,मैं पहली नारी नहीं जिसके साथ यह सब हो रहा है।यह तो सदा से ही चलता आया है।सो जाओ।” दोनों मुँह फेर कर लेट गये।कमरें में एक अजीब सी खामोशी पसरी पड़ी थी।
पेट की खातिर-
ट्रेन रूक गयी थी।उसकी मंझिल आ गयी थी।सूटकेस उठाकर वह बाहर आ गया। काफी बदल गया था शहर।एक तरफ आटो रिक्शा वाले खड़े थे तो एक तरफ सायकिल रिक्शा। जिस स्थान पर उसे पहुँचना था,वह स्टेशन से दूर था।अकेली सवारी का आटो वाले ज्यादा रूपया मांग रहे थे।उसने एक सायकिल रिक्शा वाले से पूछा,रिक्शेवाले ने सतर रूपये बताये जो उसे ज्यादा लगे।वह पचास रूपये देने को तैयार था।रिक्शेवाले ने कहा-“बहुत दूर है साहब,इससे कम में कोई नहीं तैयार होगा।”
वह थोड़ा आगे बढ़ा।मन हो रहा था एक प्याली चाय पी लें तो सफर की थकान दूर हो जाये। तभी सामने से एक बूढ़ा रिक्शा वाला बाबा आ पहुंँचा।बोला-“कहाँ जाना है बाबू ,आओ बैठो, छोड़ दूं।”उसने जगह का नाम बताया तो बाबा बोला-“सतर रुपये किराया होता है।” उसने ना कही।इस पर बाबा बोला-“इस शहर में नये लगते हो।अच्छा तुम कितना दोगे?”
उसने बताया-“पचास रूपये।” बाबा बोला-“बैठो,भाई।पहुंँचा देता हूँ।” गमछे से माथे पर आये पसीने को पोंछकर बाबा ने रिक्शा आगे बढ़ा लिया। आधी दूर पहुंँचे होंगे तो युवक ने प्रश्न किया-“बाबा,बूढ़े हो ,थके भी दिखते हो।जब वहांँ तक का किराया सतर होता है तो तुम पचास में क्यों तैयार हुए?”
बाबा साँस लेने रूका फिर बोला-“बाबू शरीर अभी नहीं थका है,पर यह जो पेट की आग होती है न वह तन और मन दोनों को थका देती है। आज सुबह से बोहनी नहीं हुयी थी।कुछ खाया भी न था।फिर मुझे तुम भी जरूरत मंद लगे। तो तैयार हो
गये। यहाँ कैसे आये?”
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पास ही चाय की टपरी दिखी।युवक ने बाबा को रिक्शा रोकने को कहा।चाय वाले से दो चाय और पारलेजी का एक पैकेट लिया।बाबा को दिया।स्वयं भी चाय पीने लगा। उसने कहा-“बाबा,आज यहाँ पर मेरा साक्षात्कार है।मुझे नौकरी की सख्त जरूरत है।मेरे लिये दुआ करना।”
चाय पीकर उसने बाबा के शरीर को देखा तो अपने पिता की याद हो आयी।कुछ सोच कर उसने जेब से सतर रूपये निकाल कर बाबा को देते हुए कहा-“बाबा,आप जाओ।कुछ खा पी लेना।मैं थोड़ा रूक कर जाऊंगा।”
बाबा नहीं मान रहा था।स्थान पर पहुंँचाये बिना रूपये न ले रहा था।मुश्किल से जब उसने कहा-“आप मेरे पिता समान हो।तब सिर्फ़ पचास रूपये लेने लगा।युवक ने जिद कर सतर रूपयेही दिये। बाबा ने आसमान की तरफ देखकर हाथ जोड़े मानो वह उस युवक के लिये दुआ मांँग रहा हो।युवक ने भी हाथ जोड़ दिये। रिक्शेवाला बाबा अनेक आशीष देता आगे बढ़ गया.युवक उन्हें जाते देखता रहा।
भय
संतोषी बरतन पर जल्दी जल्दी हाथ चला रही थी।आज दिन भर मौसम गर्म रहा।वह थक गयी थी। सुबह वह मनु को अकेला खोली में छोड़कर चली आता।नाश्ता, दूध सब देने के बाद।पड़ोस की मीना को मनु का ख्याल रखने को कह जाती।सुबह से काम पर निकलती रोज शाम हो जाती।कभी-कभी मालकिन से कह कर दोपहर के भोजन के समय घर आकर अपने हाथ से मनु को खिला कर सूला जाती।
फिर भी ड़र बना रहा था।आजकल बीमारी भी तो फैली हुई है।छाती पर पत्थर रख कर वह मनु को अकेला छोड़कर काम पर आती।पर,मन वहीं लगा रहता। मालकिन का स्वभाव दयालु था।वे उसका बहुत ख्याल रखनी।मालकिन खिलाने-पिलाने की बड़ी शौकीन थी।शहर में ही ढ़ेर सारे रिश्तेदार थे।कोई न कोई शाम को आ ही जाता।

बर्तनों का ढ़ेर बढ़ता ही जा रहा था।संतोषी की तबियत भी ठीक न थी।वह हाथ धोकर सुस्ताते बैठ गयी।तभी मालकिन कुछ बर्तन लिये आयी।संतोषी को थका जानकर पूछ बैठी-“क्या हो गया संतोषी?
वह उठते हुए बोली-“दीदी हरारत लग रही है?”
मालकिन ने आशंकित नजरों से उसे देखा-“ज्यादा खाँसी वगैरह तो नहीं है न।अच्छा तू बैठ।” मालकिन भीतर जाकर मसाला चाय का कप लिये आयी।उसे पिलाया ,फिर कुछ रूपयें और बच्चे के लिये सूखा नाश्ता देकर बोली-“अब तू घर जा।आराम कर।जरूरत पड़े तो डाक्टर को दिखा देना और एक दो दिन घर पर ही रहना।”
हाथ जोड़कर उसने मालकिन के प्रति मौन आभार प्रकट किया। घर जाते -जाते सोच रही थी कल दिन भर घर पर रखकर मनु की देखभाल करेगी।उसे मनपसंद खाना खिलायेगी।कितने दिनों से मनु बरा खाने की मांग कर रहा था।अबउसकी चाल तेज हो गयी।वह चाहती थी जल्दी घर पहुंच जाये और मनु का चेहरा देख सके।ऐसा सोचना उसे भला लगा।