नये वर्ष की पार्टी और पीली पड़ती आँखें,नव वर्ष का स्वागत है व् दायित्व बोध- लघु-कथाए

महासमुंद:-जिले के प्रसिद्ध लघु कथाकार महेश राजा की लघु कथाए नये वर्ष की पार्टी और पीली पड़ती आँखें,नव वर्ष का स्वागत है व् दायित्व बोध पाठकों के लिए उपलब्ध है ।

नये वर्ष की पार्टी और पीली पड़ती आँखें-रोशनियों की झिलमिलाहट के बीच शहर में हर तरफ पार्टियां चल रही थी।वर्ष 2020विदा हो रहा था,और 2021का आगमन कुछ मिनटों में ही अपेक्षित था। महामारी का भय कुछ कम हुआ।सभी को इंतज़ार था वैक्सीन का। इस बार शहर में हर तरफ केक और मिठाइयों की बहुत सारी दुकानें खुली थी।लोग खुश थे।सभी ने जी भर कर खरीदारी की थी।पटाखे भी खूब बिके थे।

नये वर्ष की पार्टी और पीली पड़ती आँखें,नव वर्ष का स्वागत है व् दायित्व बोध- लघु-कथाए

परेशान थे तो वे लोग जिन्हें रोज सुबह उठ कर कुछ न कुछ मेहनत कर,दिन भर खट कर घर के लिये दाल-रोटी जुटानी होती थी। ऐसा ही एक व्यक्ति रमतू था।जो इन सबसे अलग दूर एक पेड़ के पीछे छिपा खड़ा था।पहले कुछ कामकाज कर वह दो समय की रोटी जुटा लेता था।जबसे बीमार पड़ा था,लोगों ने उसे काम देना बंद कर दिया था।अब वह मजबूरन भीख मांग कर अपने बच्चों का पेट भरता था।

आज भी उसे ईंतजार था कि ये बड़े लोगों की पार्टी समाप्त हो,नौकर चाकर कुछ झूठन बाहर फेंके तो वह ले जाकर बच्चों का पेट भर सके।उसको अपने बच्चें याद आ रहे थे।उनकी पीली पड़ती आँखें याद आ रही थी,तो वह अपनी लाचारी पर रो पड़ा।पांव लड़खड़ा रहे थे।मगर किसी तरह हिम्मत कर अपने पैरों पर खड़ा था। हाल के भीतर से म्यूजिक और नाच -गाने की तेज आवाजें अब भी आ रही थी।शायद पार्टी देर रात तक चलने वाली थी।

नव वर्ष का स्वागत है

बड़ी उदास सी घड़ी थी,2020 का आखरी दिन बूढ़ा साल लाठी के सहारे धीरे धीरे क्षितिज की ओर बढ़ रहा था। उसके चेहरे पर च़िताओं की झांईयाँ थी,दुःखों की सिलवटें थी।उसने बहुत कुछ भोगा था। उसे इंतजार था उस घड़ी का जब उसके विश्राम का समय आने.वाला था। 2021नवजात शिशु के आगमन का इंतजार…..।

दूर उसे एक प्रकाश दिख रहा था।उसकी बूढ़ी आँखे चोंधिया गयी।वह इस तकलीफ़ में भी मुस्कुरा पड़ा आखिर वो घड़ी आ ही गयी।2021 की छाया ने 2020 को नमन किया।

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बूढ़े साल ने उस बालक को आशीष दिया।स्वगत कहा-“,बेटे,मेरा समय मानव जाति के लिये बहुत कठिनाई का रहा।महामारी,आगजनी,अपहरण ,बलात्कार और आंदोलन।इस बूढ़ी आँखों ने बहुत कुछ सहा।ढ़ेर सारी लाशों को कँधा दिया।मासूम की सिसकियां सुनी…और भी बहुत कुछ…।अब मैं थक गया हूँ बेटा।तुम आओ….और अपना स्थान ग्रहण करों।बहुत थक गया हूँ…..।

अलौकिक प्रकाश निकट आ गया था।उसकी आकृति स्पष्ट हो रही थी।सुकुमार शिशु। बूढ़ी आँखे मुस्कुरा उठी।पुराने साल ने नये वर्ष का स्वागत किया ।आशीष दिया।तुम्हारा आगमन समूचे विश्व के लिये वरदान सिद्ध हो…।सब कुछ ठीक हो….।

धीरे धीरे पुराना साल अँधकार में गुम हो गया।नये वर्ष का आगमन हुआ। आसमान में चमकीले प्रकाश की किरणें फूट निकला।2021 मुस्कुराता खड़ा था,चारों तरफ आतिशबाजियाँ हो रही थी।नव वर्ष का आगमन हो चुका था।सबने उत्साह से नव वर्ष का स्वागत किया।चारों तरफ खुशनुमा वातावरण स्थापित हो चुका था।

 दायित्व बोध

हर रोज की तरह सुबह की सैर के बाद राज अपनी मनपसंद जगह हनुमान मंदिर पर बैठा हुआ था। रीमा का फोन आया।वह गाँव गयी हुयी थी।कल लौटेगी। रीमा एक पढ़ी लिखी,शानदार आफिस में एक्जीक्यूटिव थी।अच्छे परिवार से थी।सब कुछ ठीक था,पर कहीं कुछ छूट गया था।

रीमा कह रही थी।गाँव आयी हूँ जरूरी काम से।इस बहाने माँ से मिलना हो गया।अवि भी साथ है,नानी से मिल कर खुश है।रीमा ने बताया अगले माह चाचा ससुर के घर पर शादी है।चाचा नहीं रहे तो सब कुछ इन्हें और मुझे करना है।इन्होंने सारा भार मुझ पर डाल दिया है।समय कम है।रुपयों की परवाह नहीं।पर,मेरे पास सीमित साधन है,कार भी न ही तो सबको कह दिया है खर्च करते जाओ बिल मुझे दे दो।

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यहाँ यह बताना लाजिमी होगा। रीमा ने ससुराल को पूरी तरह से अपना लिया है।सास जी,ससुराल साईड के उन्नीस बच्चे साथ ही अवि।सबकी पूरी जिम्मेदारी एक कुशल सारथी की तरह निभाई है।अभी पता चला कि भतीजी दो बरस पोस्ट ग्रेजुएशन के लिये उसके पास आकर रहेगी।

यह बताते हुए उसका स्वर भीगा लगा। राज मुझे जिम्मेदारी वहन से कोई परहेज नहीं।रूपयों की भी चिंता नहीं।मुझे वाहवाही भी नहीं चाहिये।परंतु छोटी छोटी बातों पर आलोचना, निंदा यह सब मुझे भीतर तक तकलीफ़ देती है।अब ऊब गयी हूँ।जी चाहता है सब छोड़कर कहीं चली जाऊं।पर,फिर अवि…..।

बापा जी ने इनके साथ ब्याहते समय कहा था कि ससुराल को अपना लेना पूरा दायित्व निभाना।बस…..आज तक दायित्व बोध ही तो निभा रही हूँ। बहुत तकलीफ़ होती है राज को भी रोना आ गया।उसने कहा,रीमा तुम्हें हिम्मत रखनी हे,अपने लिये,अवि के लिये।हम सब के लिये……।प्लीज अपना ख्याल रखना।

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