Home आलेख सिलसिला,कटघरे,टेढ़ी पूँछ,मध्यमवर्ग:-महेश राजा की लघु कथा

सिलसिला,कटघरे,टेढ़ी पूँछ,मध्यमवर्ग:-महेश राजा की लघु कथा

"क्या सोच रही हो?"-"सोचने के लिये अब कुछ नहीं है।"

महासमुंद- जिले के ख्यातिप्राप्त लघुकथाकार महेश राजा की लघु कथाए सिलसिला,कटघरे,टेढ़ी पूँछ,मध्यमवर्ग  सुधि पाठकों के लिए उपलब्ध है

सिलसिला “क्या सोच रही हो?”-“सोचने के लिये अब कुछ नहीं है।”-इतनी चुप क्यों हो?कुछ कहती क्यों नहीं।”
-“कहने सुनने को अब कुछ बाकी नहीं बचा।”-“इतनी तल्खी?आखिर क्यों?” -“सोचो,शायद!कुछ याद आ जाये।”-“इस तरह से कैसे चलेगा?”

-जैसा पहले चलते आया है।फिक्र मत करो,तुम्हारी गृहस्थी वैसे ही चलती रहेगी।तुम्हारा खाना,पीना,कपड़े,सोना और बच्चों की जिम्मेदारी।सब करती रहूँगी। और हाँ ,मैं पहली नारी नहीं जिसके साथ यह सब हो रहा है।यह तो सदा से ही चलता आया है।सो जाओ।” दोनों मुँह फेर कर लेट गये।कमरें में एक अजीब सी खामोशी पसरी पड़ी थी।

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कटघरे

लगभग दोनों साथ ही दुकान से बाहर आये।उन्होंने पहचान लिया,वह माया थी। हाय हल्लो के बाद उन्होंने पूछा,-माया,दुकान पर जो लड़का बैठा था,वह किसी बहाने से तुम्हें छू रहा था।कँधों पर हाथ रख रहा था।तुमने एतराज नहीं किया।

माया खोखली हँसी से बोली-,अँकल, हम सब समझते हैं।इश्वर ने हम लड़कियों को अद्भुत शक्ति दी है।आँखें देख कर पहचान लेते हैं। परंतु यह तो रोज की बात है।किस किस को रोके।अजब भेड़िये हैं।घर से निकले नहीं कि आँखों से नोचने लगते हैं।वह तो युवक ठहरा,हमें तो आपकी उम्र से लेकर बड़ी उम्र के लोग टटोलते हैं।अब तो आदत पड़ गयी।

वे सँभल गये।वे माया के माथे पर हाथ रखने ही जा रहे थे,जाने वह क्या सोचती।भूखे भेड़ियों के कारण अब पुरूष वर्ग हमेंशा कटघरे में ही रहेगा। -कभी घर आना।तुम्हारी चाची बहुत याद करती है,कह कर वे आगे बढ़ गये।

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टेढ़ी पूँछ

एक टेढी पूंँछ वाले कुत्ते ने सीधी पूंँछ वाले कुत्ते से पूछा,”क्यों पार्टनर!तुम्हारी दूम सीधी कैसे हो गयी?क्या तुम्हारे मालिक ने इसे पोंगली मे डाल दिया था”?

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सीधी पूंँछ वाला कुत्ता पहले हीन भावना से ग्रसित हुआ फिर साहस बटोर कर उसने कहा,”बात दरअसल यह है कि मैं अपनी पूंछ सीधी करने का अभ्यास कर रहा हूं।”

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टेढी पूंछ वाला कुता बोला,” कुत्ते की पहचान को क्यों संकट में डाल रहे हो?अभी हम कुत्ते इतने स्थापित नहीं हुए है कि चुनाव मे खडे हो सके।जब तक हमारी पूंँछ टेढ़ी रहेगी,आदमी हमेशा हम कुत्तों से डरेगा।”

मध्यमवर्ग

तालाबँदी के दौरान कुछ लोग कवि बन गये।आनलाईन कवि सम्मेलन का चलन बढ़ गया।कुछ गद्य लिखने लगे।और काफी सारे कापी पेस्ट से ही अपना काम चलाने लगे। एक प्रबुद्ध समूह थाःवे सारे वाट्सअप या वीडियो कालिंग के द्बारा चेट कर लेते।आज शाम को भी वे सब तात्कालिक विकट समय की बात कर रहे थे।

तभी मुसद्दी लाल ने कहा-“भाईयों इस महामारी ने तो तंग कर के रख दिया है।समझ में ही नहीं आता ,हम क्या करें,अर्थ व्यवस्था पूरी तरह से बिगड़ गयी है,करे तो क्या करें।” दूसरे ने कहा-“ठीक कहते हो मित्र।सबसे ज्यादा तकलीफ़ तो हम मध्यम वर्गीय लोगों की है,न सह सकते न कुछ कह सकते।शासन ने भी हमारे लिये कुछ नहीं किया।”

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एक व्यंग्य कार कवि मित्र ने कुछ इस तरह से कहा।ज्यों का त्यों प्रस्तुत-

“गरीबों को सब्सिडी मिली,अमीरों को मिली रिबेट।
मिड़ल क्लास तुम टी.वी. देखो,तुमको मिली ड़िबेट।

बात सच थी,सब देर तक हँसते रहे।तभी मुसद्दी लाल कह उठे-“चलिये मैं फोन रखता हूँ, टी.वी. पर महाभारत आने.वाली है।” सब मित्र एक बार फिर हँस पड़े।।

परिचय

महेश राजा
जन्म:26 फरवरी
शिक्षा:बी.एस.सी.एम.ए. साहित्य.एम.ए.मनोविज्ञान
जनसंपर्क अधिकारी, भारतीय संचार लिमिटेड।
1983से पहले कविता,कहानियाँ लिखी।फिर लघुकथा और लघुव्यंग्य पर कार्य।
दो पुस्तकें1/बगुलाभगत एवम2/नमस्कार प्रजातंत्र प्रकाशित।
कागज की नाव,संकलन प्रकाशनाधीन।
दस साझा संकलन में लघुकथाऐं प्रकाशित
रचनाएं गुजराती, छतीसगढ़ी, पंजाबी, अंग्रेजी,मलयालम और मराठी,उडिय़ा में अनुदित।
पचपन लघुकथाऐं रविशंकर विश्व विद्यालय के शोध प्रबंध में शामिल।
कनाडा से वसुधा में निरंतर प्रकाशन।
भारत की हर छोटी,बड़ी पत्र पत्रिकाओं में निरंतर लेखन और प्रकाशन।
आकाशवाणी रायपुर और दूरदर्शन से प्रसारण।
पता: महेश राजा वसंत /51,कालेज रोड़।महासमुंद।छत्तीसगढ़।
493445
मो.नं.9425201544

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