महासमुंद-जिले के प्रसिद्ध लघुकथाकार महेश राजा की लघुकथा भूख और मूड, टेढ़ी पूँछ, लाॅजिक, इस बार छुट्टियों में व् सरकारी नौकर सुधि पाठकों के लिए उपलब्ध है।
भूख और मूडः
डिनर चल रहा था।लाऊडस्पीकर पर पाप धुन बज रही थी।रात के ग्यारह बजे थे। एक बड़े अफसर ने अपने प्रमोशन अवसर पर यह पार्टी का आयोजन किया था।जलाराम केटरर को हायर किया गया था।
बंँगले के बाहर कुछ गरीब प्रतीक्षा मे थे कि कब जूठन बाहर फेंकी जायेगी। एक ने अपने साथी से कहा,”क्यों यार,ये साहब लोग खाने में इतनी देर क्यों लगाते है?”
दूसरे ने जवाब दिया,”अरे,वो साहब लोग है…अपनी तरह नहीं कि जो मिला,भकोस लिया।..अरे भ ई खाने के पहले उन्हे मूड़ बनाना पडता है,समझा….?
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टेढ़ी पूँछ
एक टेढ़ी पूँछ वाले कुत्ते ने सीधी पूँछ वाले कुत्ते से पूछा-क्यों गुरू,ये तो बताओ कि तुम्हारी दूम सीधी कैसे हो गयी?क्या तुम्हारे मालिक ने इसे पोंगली में डाल दिया था।?
सीधी पूँछ वाला कुत्ता पहले हीनभावना से ग्रस्त हुआ।फिर साहस बटोर कर बोला–बात दरअसल यह है कि मैं अपनी पूँछ सीधी करने की प्रेक्टिस कर रहा हूँ।
टेढ़ी पूँछ वाला कुत्ता बोला-कुत्तों की पहचान को संकट में क्यों डाल रहे हो गुरू।अभी हम कुत्ते इतने स्थापित नहीं हुए हैं कि चुनाव में खड़े हो सकें?जब तक हमारी पूँछें टेढ़ी रहेंगी,आदमी हम कुत्तों से डरेगा।
लाॅजिक
बेटा भाविक, बहु हेतल और पोता काव्य सभी, शनिवार वीकेंड पर सब लान में बैठ कर, चाय-दूध का आनंद ले रहे थे। आरती देवी भी शहर से बेटे भाविक के पास आई हुई थीं। अपने पोते और बेटे ओर देखते हुए उन्होंने कहा।
– तुम बाप-बेटे के सिर के बाल बहुत बढ़ गये हैं। हाँ मम्मी, सोच रहे हैं बारबर को घर बुला लें।
भाविक ने तुरंत कहा। – आज नहीं। आज शनिवार है। आज के दिन बाल नहीं बनाते। काव्य ध्यान से उनकी बातें सुन रहा था। बीच में ही बोल पड़ा। क्यों दादी? उससे क्या होगा। – घर में शुरु से ही रिवाज रहा। पर दादी,कोई लाजिक तो होगा? काव्य समझदार बच्चा था। उसने प्रश्न किया।
यह सब मैं न जानूँ। सब बड़े-बूढ़े कहते आये हैं तो हमने भी मान ली। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा। काव्य इससे पहले कि कुछ सोचता, भाविक ने हेतल को ईशारा किया। कल सुबह दस बजे का समय तय कर लेते हैं। पिता-पुत्र साथ-साथ बाल बनवा लेंगे।
इस बार छुट्टियों में
आज सुबह ही माधव का मैसेज आया तो वह चिंता में पड गया। माधव उसका बेस्ट फ्रेंड रहा।बचपन, पढाई साथ साथ हुई।जब बडे हुए,ब्याह हो गया,अपने अपने केरियर के सिल सिले मे दूर दूर बस गये।पहले उसने माधव से कई बार आकर मिल जाने का अनुरोध किया था।लेकिन माधव टालते गया।
अब तो दोनों के दो दो बच्चे हो गये थे।माधव ने लिखा था,इस बार गर्मियों मे उस तरफ का कार्यक्रम बन रहा है.सो आठ दस दिन तुम्हारे यहां भी रह लेंगे।
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पत्नी को बताने पर वह भी चिंतित हो उठी।पहले की बात और ही थी।अब तो बच्चे बडे हो गये.खर्च भी बढ गये थे।इस माह वेतन भी न मिला था।जीपीएफ की कटौती,लोन आदि के कारण बढ गयी थी।ले देकर गुजारा हो रहा था। काफी सोच विचार के बाद उसने जवाब लिखा,प्रिय मित्र,तुम सबके आने से हम सबको बहुत प्रसन्नता होती।मगर खेद है इस बार की छुट्टियों मे मां के पास गांव जाने की सोच रहे है।बच्चे दादी से मिलने की जिद कर रहे है।
सरकारी नौकर
एक बड़े शहर के डाकघर में डाक-वितरण के समय रखे हुए पैकेटों में से तीव्र दुर्गंध उठी।एक लिफ़ाफ़ा देख कर पोस्ट मेन को शक हुआ,उसने पोस्ट मास्टर को रिपोर्ट की।दो गवाहों के सामने लिफ़ाफ़ा खोला गया।उसमें से एक मरा हुआ चूहा निकला।उसे देख कर पोस्ट मास्टर डर गए।
किसी ने पूछा-क्या हुआ डाक साहब,मरे हुए चूहें से डर गए?
-पोस्ट मास्टर बड़ी सादगी से बोले-भई, हम ठहरे सरकारी नौकर।हमें तो सबसे डरना पड़ता हैं।पता नहीं इस चूहे को किस बड़े आदमी का संरक्षण प्राप्त हैं।
जीवन परिचय-
जन्म:26 फरवरी
शिक्षा:बी.एस.सी.एम.ए. साहित्य.एम.ए.मनोविज्ञान
जनसंपर्क अधिकारी, भारतीय संचार लिमिटेड।
1983 से पहले कविता,कहानियाँ लिखी।फिर लघुकथा और लघुव्यंग्य पर कार्य।
महेश राजा की दो पुस्तकें1/बगुला भगत एवम2/नमस्कार प्रजातंत्र प्रकाशित।
कागज की नाव,संकलन प्रकाशनाधीन।
दस साझा संकलन में लघुकथाऐं प्रकाशित
रचनाएं गुजराती, छतीसगढ़ी, पंजाबी, अंग्रेजी,मलयालम और मराठी,उडिय़ा में अनुदित।
पचपन लघुकथाऐं रविशंकर विश्व विद्यालय के शोध प्रबंध में शामिल।
कनाडा से वसुधा में निरंतर प्रकाशन।
भारत की हर छोटी,बड़ी पत्र पत्रिकाओं में निरंतर लेखन और प्रकाशन।
आकाशवाणी रायपुर और दूरदर्शन से प्रसारण।
पता:वसंत /51,कालेज रोड़।महासमुंद।छत्तीसगढ़।
493445
मो.नं.9425201544
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