महासमुंद। स्थानीय दादा बाड़ा में चल रहे श्रीमद् भागवत कथा में व्यास पीठ से पं. हिमांशु कृष्ण भारद्वाज ने कहा कि जो व्यक्ति कष्ट के समय काम आए, आपका दुख दूर करे, उसे नही भूलना चाहिए। वह तुम्हें भगवान के रूप में मदद पहुंचाता है।
राधारानी को याद कर जब भगवान कृष्ण सोते हुए रोते है तो आंख से आंसू बहता है उसे माता रूखमणी देख लेती और पूछती है कि प्रभु आप क्यों रो रहे है तो भगवान कृष्ण, राधारानी के बारे में बताते है इस पर रूखमणी जी सवाल करती है कि ऐसा राधारानी में क्या है, जो उन्हें याद कर रो रहे है। इस पर ठाकुर जी कहते है कि समय आने पर इसका उत्तर तुम्हें स्वयं मिल जाएगा।
जल पिलाने के लिए कोई राजी नही
एक दिन प्रभु के उदर में दर्द हुआ और रोने लगे और औषधियों से ठीक नही होने पर स्वयं प्रभु से उपाय पूछते है तो भगवान कृष्ण कहते है कि यदि कोई उसे अपने चरणों का जल पिला दे तो उनका दर्द ठीक हो जाएगा। भगवान को चरणों का जल पिलाने के लिए कोई राजी इसलिए नही हुआ कि उन्हें नरक में जाना पड़ेगा।
इस पर भगवान कृष्ण नारद मुनि से कहते है तुम राधारानी के पास जाओ और उन्हें मेरा हाल बताना। ब्रज में जब राधारानी को कृष्ण के उदर में दर्द होने और दर्द ठीक होने का उपाय बताया गया तो वह तुंरत अपने चरणों का जल कृष्ण की पीड़ा हरने भेज दिया। जल पीते ही कृष्ण जी ठीक हो गए सभी रानी-पटरानी प्रसन्न हो गए। उसी समय भगवान कृष्ण रूखमणी से कहते है कि अब तुम्हें राधारानी और तुममें क्या अंतर है। इस प्रश्र का उत्तर मिल गया होगा।
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माला से स्वागत कर लिया आशीर्वाद
कथा का बखान करने मंच की ओर पधार रहे पं. हिमांशु कृष्ण भारद्वाज जी का मुख्य जजमान प्रकाश चंद्राकर, ललिता चंद्राकर, सह जजमान ईश्वर सिन्हा, सुनितारानी सिन्हा तथा भागवत कथा आयोजन समिति की ओर भाऊराम साहू, तारेश्वरी साहू ने महराज के चरणों में पुष्प वर्षा करते हुए कथा पंडाल से व्यास पीठ तक अगुवानी की। कथा के अंतिम दिवस आयोजन समिति के सभी सदस्यों ने मंच पर महराज जी का एक बड़े माला से स्वागत कर आशीर्वाद प्राप्त किया। नपा के पार्षदों ने अपने-अपने वार्ड के नागरिकों की ओर से भी महराज का स्वागत किया।
ईच्छाओं की पूर्ति के लिए लिया अवतार
भागवत कथा का बखान करते हुए पं. भारद्वाज जी ने अनेक प्रसंगों का कथा श्रवण कराते हुए कहा कि भगवान इस धरा पर ईच्छाओं की पूर्ति के लिए जन्म लेते है। भगवान कृष्ण के 16 हजार 108 विवाह के बारे में विस्तार से कथा श्रवण करते हुए कहा कि भगवान ने धर्म और समाज की रक्षा के लिए ये सभी विवाह किए है। 8 पटरानियों के विवाह के बाद जब यह जानकारी प्रभु को मिली कि नरकासुर ने 16 हजार एक सौ राजकुमारियों को विवाह करने के लिए बंदी बना लिया है।
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इस पर वे नरकासुर का संहारकर सभी राजकुमारियों छुड़ाते है इस पर राजकुमारियां कहती है कि उन्हें नरकासुर द्वारा बंदीगृह में रखे जाने के कारण लोग उन्हें अशुद्ध मानकर कोई विवाह नही करेंगे आप हमसे विवाह करे, या फिर गलत मार्ग में चले जाएंगे। इस पर माता देवकी ने सभी 8 पटरानियों रूखमणी, जामवंती, सत्यभामा, मित्रवृंदा, कालिंंंदी से विवाह किया और माता की आज्ञा के बाद धर्म और समाज के रक्षा के साथ ही नारियों को सम्मान देने के लिए प्रभु ने सभी राजकुमारियों से विवाह किया।
रूखमणी के पुत्र प्रद्युम्र का जन्म हुआ। वे कामदेव के अवतार थे, भगवान शिव की तपस्या भंग करने पर वे भस्म हो गए थे तब उन्हें वरदान मिला था कि भगवान कृष्ण के यहां तुम्हारा जन्म होगा। इसी तरह त्रेतायुग में जामवंत ने जब युद्ध की इच्छा बताई तो प्रभु ने कहा कि उनकी यह इच्छा कृष्ण जन्म में पुरा करूंगा।
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