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पर्यावरण दिवस पर विशेष “पर्यावरण रक्षा” अंजाना ड़र,मन का सँतोष,परवरिश-महेश राजा

हमें अब भी संभल जाना होगा।नहीं तो एक दिन ऐसा आयेगा कि हम,,,

पर्यावरण दिवस पर विशेष

महासमुंद- जिले के प्रसिद्ध लघुकथाकार महेश राजा की लघु कथाए “पर्यावरण रक्षा” अंजाना ड़र,मन का सँतोष,परवरिश सुधि पाठकों के लिए उपलब्ध है।

पर्यावरण रक्षा-वे हर रोज की तरह घर के पीछे आँगन में पेड़-पौधों को पानी पिला रहे थे।साथ ही घाँस आदि को साफ करते जा रहे थे।नन्हां काव्य उनके साथ टहल भी रहा था और ज्ञान विज्ञान के बारे में पूछ भी रहा था। बात चल पड़ी, पर्यावरण और पेड़पौधों की जरूरत और सुरक्षा की।वे काव्य से कह रहे थे,पेड़ पौधे हमारे जीवन के लिये कितने उपयोगी है,वे अशुद्ध वायु को ग्रहण कर हमें जीवन- दायिनी शुद्ध हवा प्रदान करते है। परंतु हम मानव इस बात की कदर नहीं करते है। पेड़पौधे काट कर अपने लिये विनाश का साधन जुटाते है।

-यह जो बारिश का न होना,या होना प्रदूषण आदि,भूकंप,और अन्य तूफान आदि का आना ,नदी नालों में मीलों के गंदे पानी का बहाना,हम सबके लिये सबक है। हमें अब भी संभल जाना होगा।नहीं तो एक दिन ऐसा आयेगा कि हम शुद्ध वायु को तरस जायेंगे।

उदाहरण,सपना व् शहर की हवा- महासमुंद जिले के प्रसिद्ध लघु कथाकार महेश राजा की

पर्यावरण दिवस पर विशेष "पर्यावरण रक्षा" अंजाना ड़र,मन का सँतोष,परवरिश-महेश राजा
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तभी बाहर शोर उठा।देखने पर पता चला एक व्यक्ति पेड़ों की अवैध कटायी कर रहा था।वनविभाग के स्टाफ ने उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया है। काव्य भोलेपन से बोला-“दादा यह व्यक्ति कितना गलत काम कर रहा था।यह हम भावी पीढ़ियों का अपराधी है,इसे सजा अवश्य मिलनी चाहिए।”

-” हाँ बेटा,हमें पेड़पौधों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिये।उसकी अच्छे से देखभाल करनी चाहिये।हर जन्मदिन पर पाँच पौधे अवश्य लगाना चाहिये।पानी की बचत करनी चाहिये।साथ ही हमें अपने आसपास की साफ सफाई का भी ध्यान रखना चाहिये।ताकि आनेवाले दिनों में हमें किसी गंभीर मुसीबत या महामारी का सामना न करना पड़े।”-वे कह रहे थे। उन्होंने ने देखा काव्य अपने नन्हें हाथों से गमलों की सफाई कर रहा था।साथ ही छोटे मग से पानी भी ड़ाल रहा था। वे मुस्कुरा दिये।अब उन्हें लगा हमारा देश इन अबोध हाथों में सुरक्षित है।

अंजाना ड़र

-वे आफिस समय पर पहुंच गये थे।अपने चैंबर में बैठकर आज की पहली फाईल देख रहे थे। तभी उन्हें कुछ याद आया तो रामजी को आवाज दी और रवि को बुलाने को कहा।रवि उनका मित्र और सहकर्मी था। तभी अचानक मौसम ने करवट बदली ।बादलों की गड़गड़ाहट के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी।उन्हें कभी भी बारिश पसंद न थी।खिड़की से बाहर का दृश्य देखने लगे,लोग जल्दी-जल्दी अपने गंतव्य की ओर भाग रहे थे।बादल मानो फट पड़ने को थे।

रवि आये तो वे अन्मयस्क बैठे हुए थे।रवि ने पूछा,तबियत तो ठीक है न।फिर रामजी को दो मग काफी लाने को कहा। वे अपनी कुर्सी पर चिपक कर बैठे थे।चेहरे पर अंजाना भय था।रवि समझ गया। उसने बात करनी चाही।पर,वे चुपचाप खिड़की से बिजली की चमक और बादलों की गडगड़ाहट देख और सुन रहे थे। -“वो बारिश…बिजली..बादलों की गरज….रिनी…रिनी को इन सबसे बड़ा ड़र लगता है…।” वे बड़बड़ा रहे थे।

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रवि ने ढ़ाढ़स दी-“,जरूरी थोड़े ही है,रिनी के शहर में बारिश हो रही हो।”आप चिंता मत करो।” -“तुम तो जानते हो न।रिनी को बादल और बिजली से बड़ा ड़र लगता है।वह कैसे हमारे घर…मेरे पास आ जाती थी…अब …वो….अकेली…क्या करती होगी…..?”वह ठीक…तो…होगी..न…?  रवि ने शांत मन से कहा हाँ,”भाई…अब वह अकेली नहीं है?उसका विवाह हो गया है..।उसका ख्याल रखने को उसका पति है…न….।”

वे आश्वस्त न हुए।काफी ठंड़ी हो रही थी।वे अपलक खिड़की से बाहर देख रहे थे।तभी अचानक बिजली की जोरदार चमक हुयी और दूर कहीं बिजली गिरी है,ऐसा महसूस हुआ। वे और भी ड़र गये।चेहरा पसीना-पसीना हो रहा था…अज्ञात भय से और बहुत खो देने के दुःख से उनकी आँखों से आँसूओं की धार बह निकली। बाहर जोरों की बारिश हो रही थी।बीच बीच में बादल गरज उठते और जोरों से बिजली चमक उठती।

मन का सँतोष-

दो दिवसीय कार्यक्रम बहुत सफल रहा।आयोजिका द्बय डा.सोनाली और डा.रूपाली बहुत खुश थे।इस महामारी में उन्होंने युवापीढ़ी की समस्या पर मनो विशेषज्ञों से समय लेकर आयोजन का बीड़ा उठाया था।वे सफल भी रही।एक पत्रकार ने बधाई देते हुए पूछा,आपकी सँस्था तो बहुत बड़ी है,फिर आप दोनों ने ही यह भार क्यों उठाया।शेष सब की भूमिका क्या रही?आप इसका श्रेय किसे देती है?

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डा. सोनाली ने बताया,सभी ने अपरोक्ष रूप से अपनी भूमिका निभायी। आगे रूपाली ने कहा,हम दोनों ने यह कार्य वाहवाही के लिये बिल्कुल नहीं किया।यह आज के समय की जरुरत थी।अन्य सँस्था ओं ने भी पूरा सहयोग दिया।दूसरी बात इससे हम दोनों को आत्मिक सुख मिला।यही हमारे लिये बड़ी बात है।भविष्य में भी आप सबके सहयोग से हम इस तरह के आयोजन करते रहेंगे।

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परवरिश-

सामने कोठी के पास एक मैदान था।उसमें दो कमरें भी बने थे। सुबह सुबह उन्होंने देखा उस जगह पर कोई कार्यक्रम चल रहा है।युवा गण फोटो खिंच रहे है,नाच रहे है।पार्टी पापर से रंगबिरंगी कागज की पन्नियाँ उडा रहे है।साथ ही पानी व ठंड़े की बोतल पीकर इधर-उधर फेंक रहे थे।

एक कुरता पाजामा पहने वृद्ध हाथ में बड़ा सा झोला लिये कचरा उठाकर थैले में रखते जा रहे है। उन्होंने सौजन्य वश पूछा,कोई कार्यक्रम चल रहा है,आप क्या इस परिवार में काम करते है।

एक लंँबी साँस लेकर वृद्ध व्यक्ति ने कहा,मैं इस परिवार का मुखिया हूँ।पोते का विवाह है,महामारी के कारण घर के सब मिल कर आयोजन कर रहे थे।यह जगह एक परिचित से एक दिन के लिये इस शर्त पर ली थी कि साफ सफाई का ध्यान रखा जायेगा। थोड़ा रूक कर बोले,यह बच्चे यह सब कहाँ समझते है।कचरा फैला रहे है।मैं समेट रहा हूंँ।जरूर मेरी परवरिश में ही कोई कमी रह गयी है।