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महेश राजा की लघुकथा आदतन, मौन के अलावा अन्य कथा

एक कार्यक्रम का आयोजन था। मुख्य अतिथि हमेंशा की तरह एक घंटा देर से आये

महासमुंद- जिले के ख्यातिप्राप्त लघुकथाकार महेश राजा की लघु कथाए –आदतन, मौन परिवार-पहल आदम प्रवृत्ति सुधि पाठकों के लिए उपलब्ध है ।

आदतन-एक कार्यक्रम का आयोजन था। मुख्य अतिथि हमेंशा की तरह एक घंटा देर से आये।भाषण उन्होंने शानदार पढ़ा।किसी तरह कार्यक्रम समाप्त हुआ।आभार प्रदर्शन होने वाला था। एक समाज सेवक जो इस तरह के कार्यक्रम में जरूर पहुँचते।वे आ पहुँचे। आते ही उन्होंने आयोजक से पूछा-“मुझे आने में देर तो नहीं हुई न?”

आयोजक ने उनका स्वागत करते हुए शांँत स्वर में कहा-“नहीं.. नहीं. आप एकदम सही समय पर आये है।आभार प्रदर्शन हो रहा है,साथ ही स्वाल्पाहार का आयोजन भी शेष है।आपका हार्दिक स्वागत है।” मैं यह सब सुन रहा था।एकाएक मुझे बचपन की बात याद हो आयी।घर या पडोस में जब कभी कथा होती,बच्चे खेल में लगे रहते।जैसे ही आरती की घंँटी बजती,सब स्वतः भागते हुए आ पहुँचते।आरती के तुरंँत बाद प्रसाद वितरण कार्यक्रम होता था।

मौन

-“क्या बात है,आज बहुत चुप-चुप -सी हो।”-“कुछ नहीं।बस ऐसे ही।”-“नहीं. नहीं. कोई बात तो है।मुझे नहीं बताओगी?
-“कुछ बात हो तो बताऊं न।”-“नहीं, मुझे तुम्हारा मौन रहना खल रहा है।”कभी कभी मौन रहना भी जरूरी है जीवन में
अठखेलियाँ बातों की हर वक्त जरूरी तो नहीं।

-“तुम टाल रही हो?क्या मेरी किसी बात से खफा हो?”-“नहीं..।” -“देखो,मैं तुम्हारी खामोशी सहन नहीं कर सकता।”
-“पुरूष हो इसलिये न।क्या नारी अपनी मरजी से चुप भी नहीं रह सकती।”-“यह मैं नहीं जानता।पर,तुम मौन रहो यह मंजूर नहीं मुझे।”

-” यह तो अनादि काल से होता आ रहा है।नारी जब छोटी होती है तो माँ चुप रहने को कहती है,फिर शिक्षक और विवाह के बाद पति।उसके बाद बेटा-बहू।यह नारी की नियति है।”पुरूष नारी पर अपना अधिकार समझता है।उसके मौन के मनोविज्ञान को वह नहीं समझ पाता!क्योंकि मौन होता ही बड़ा विकट है।जिस दिन पुरूष मौन रहने का अर्थ या मौन रहना सीख जायेगी;उस दिन से समाज में क्रांति आ जायेगी और कभी न कभी यह दिन अवश्य आयेगा।” -” आज मुझे मौन रह कर ही अपने नारी होने का अर्थ समझना है,तो कृपा कर आज मुझे अकेला छोड़ दो।”

परिवार-

सोशल साईंस की आनलाइन क्लास के बाद भव्यन ने अपने पापा -मम्मी से पूछा,-यह परिवार क्या होता है? दीपिका हँसी,-बेटा आप मैं और पापा,यही तो है परिवार।- पर,शिरीन मैम तो कह रही थी,परिवार में दादा दादी,चाचा चाची बुआ और बहन सब होते हैं।

-वो सब कहाँ हैं?मेरी तो कोई बहन भी नहीं है।क्लास मेट पीहू कह रही थी,उसके घर में तो सब रहते है,दस लोग। दीपिका चुप हो गयी।अरविंद ने बच्चे को बहलाना चाहा,-बेटे,दादा- दादी गाँव में रहते है।उन्हें वहीं पर अच्छा लगता है।चाचा- चाची दूसरे शहर में है,जाब करते है।बुआ की शादी हो गयी।वे फारेन में है।

भव्य समझना नहीं चाह रहा था।बार- बार जिद कर रहा था।सब मिल कर साथ-साथ कब रहेंगे।और..मेरा भाई या बहन कब आयेगी?

पहल

वे शहर के बहुत बडे व्यवसायी थे,साथ ही समाजसेवक भी। आज वे बहुत खुश थे क्योंकि उन्हें नगर की प्रतिष्ठित शाला में हिंदी दिवस पर विशेष अतिथि बनाया गया था। उन्होंने अपने सम्बोधन में शिक्षा और हिंदी पर बहुत कुछ कहा।खासकर उनकी इस बात पर कि -‘हमें अपने बच्चों को हिंदी माध्यम की शाला में पढ़ाना चाहिये।इसकी पहल हमें अपने ही घर से करनी होगी।

उनकी इस बात पर खूब तालियांँ बजी थी। उत्साह से भरे वे घर पहुंँचे।बहुत दिनों बाद उन्हें जिन्दगी में कुछ सुकून के पल मिले। पत्नी जी ने उन्हें आते देख कर रामू को पानी और चाय लाने को कहा। उन्होंने बडे उत्साह से आज के कार्यक्रम की बात बतायी।उनका साढे तीन साल का पोता पास ही खेल रहा था।

बातों के दौरान पत्नी ने याद दिलाया,पोता बडा हो गया है,उसका किसी स्कूल में दाखिला करवा दो। उन्होंने गंभीरता से सोचा।वे ज्यादा नहीं पढ़पाये थे।पोते को जरूर पढ़ाना है,उच्च शिक्षित बनाना चाहते थे। अब वे मोबाईल पर पोते के एडमिशन हेतु नगर के सबसे महंँगे कान्वेंट स्कूल के फादर से बात कर रहे थे।

आदम प्रवृत्ति-

वह किसी कार्य वश कालोनी से गुजर रहे थे।उसके आगे आगे एक मोटे महाशय जल्दी में कहीँ जा रहे थे। आगे मोड़ के पास पहुंचते ही मोटे महाशय के पैर के नीचे केले का छिलका आ गया।वे धड़ाम से गिर पडे।उसकी नजर पडी तो सहायता करने के बजाये ठहाका मार कर हंँस पडे। मोटे महाशय झुंझलाते हुए उठे ओर चल दिये।

केले का छिलका सडक पर पडा सुबक रहा था। दो घंटे बाद वे केन्द्रीय कार्यालय के दफ्तर से सीटी बजाते हुए निकले।वे प्रसन्न चित थे।उनका काम आसानी से निपट गया था। वे तेज चाल से उसी रास्ते से लौट रहे थे।जहांँ वे सुबह चले थे। अचानक केले का छिलका उनके पांँव के नीचे आ गया।वे मुंह के बल गिर पडे।खासी चोट आयी।कपड़े भी खराब हो गये।आते जाते सब उन पर हँस रहे थे।

उनका चेहरा तमतमा रहा था।ले- देकर उठ खडे हुए।बड़बड़ाने लगे,जाने कैसे कैसे गंँवार लोग है।केला खाकर छिलका सडक पर फेंक देते है।फिर गुस्से से एक लात छिलके पर मारी।केले का छिलका पास की गंदी नाली मे जा गिरा। वे झल्ला उठे।उधर केले का छिलका ठहाके लगाकर हंँसता रहा।

लेखक परिचय

महेश राजा
जन्म:26 फरवरी
शिक्षा:बी.एस.सी.एम.ए. साहित्य.एम.ए.मनोविज्ञान
जनसंपर्क अधिकारी, भारतीय संचार लिमिटेड।
1983से पहले कविता,कहानियाँ लिखी।फिर लघुकथा और लघुव्यंग्य पर कार्य।
दो पुस्तकें1/बगुलाभगत एवम2/नमस्कार प्रजातंत्र प्रकाशित।
कागज की नाव,संकलन प्रकाशनाधीन।
दस साझा संकलन में लघुकथाऐं प्रकाशित
रचनाएं गुजराती, छतीसगढ़ी, पंजाबी, अंग्रेजी,मलयालम और मराठी,उडिय़ा में अनुदित।
पचपन लघुकथाऐं रविशंकर विश्व विद्यालय के शोध प्रबंध में शामिल।
कनाडा से वसुधा में निरंतर प्रकाशन।
भारत की हर छोटी,बड़ी पत्र पत्रिकाओं में निरंतर लेखन और प्रकाशन।
आकाशवाणी रायपुर और दूरदर्शन से प्रसारण।
पता:वसंत /51,कालेज रोड़।महासमुंद।छत्तीसगढ़।
493445
मो.नं.9425201544

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